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Saturday, 15 April 2017

कहानी की कहानी...

में कहानी कहने वाली थी!मेने पसंदगी के लिए जो कहानी कही थी,उसे बदलना था!मेने घर पे आके और बच्चो के साथ रिहर्सल में दला तरवाडी वाली कहानी की तैयारी की थी !
में रेकोर्डिंग के लिए पहुंची!वहा जाके मुझे अवगत किया गया की मेरी कहानी बदलनी पड़ेगी!मेने दूसरी कहानी के बारेमे सोचना शुरू किया!मेने बंदर और बिल्ली की कहानी कही!
मेरे लिए कहानी का रिकोर्डिग और एक टीम से कहानी पसंद करने का ऐ मेरा पहेला मौक़ा था!मुझे स्टूडियो में मार्गदर्शन मिला!मेरी कहानी रिकोर्ड हुई!मुझे और भी कहानियों के लिए अब महेनत करनी होगी!में इस के लिए डॉ.टी.एस.जोशी सर,श्रीमती कोमल व्यास,श्री सोनल चौहान,श्रीमति रचना पाठक,श्री याह्या सपाट वाला और डॉ.भावेश पंड्या को याद करते हुए इस काम में सहयोगी  सभीका आभार व्यक्त करती हूँ! 

Tuesday, 21 March 2017

पजल्स ही क्यों?

पजल्स सॉल्व करना तुम बच्चों को बहुत पसंद होता है न। तुम्हें तो बस बहाना चाहिए इन्हें खेलने का। किसी पजल को सॉल्व करने के लिए तो दोस्तों से शर्त भी लग जाती होगी। लेकिन क्या तुम्हें पता है कि क्विज और पजल्स का जन्म कब हुआ? नहीं पता, कोई बात नहीं। आज अनुराधा गोयल तुम्हें बता रही हैं कि ये कहां से शुरू हुईं और कैसे पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गईं
क्विज और पजल्स की दुनिया को जानने से पहले इन दोनों के बीच के फर्क को समझ लेते हैं। क्विज में तुमसे कुछ सवाल पूछे जाते हैं, जिनका जवाब देना होता है। अगर सही जवाब दे दिया तो इसका मतलब होता है कि तुम इंटेलिजेंट हो और पजल एक तरह का गेम होता है, जिसमें पहेली छिपी होती है।
 
ऐसा माना जाता है कि 1784 में सबसे पहले क्विज शब्द का प्रयोग किया गया। तब इसका अर्थ, ‘ऑड पर्सन’ यानी अजीब सा व्यक्ति हुआ करता था। क्विज वर्ड के ओरिजन का कोई साफ प्रमाण नहीं मिलता। फिर भी माना जाता है कि 1847 में पहली बार प्रश्न-उत्तर या पूछताछ के लिए इस वर्ड का प्रयोग किया गया था।
 
क्विज शब्द, लैटिन शब्द क्यू और इज से मिलकर बना है जिसका अर्थ होता है, आप कौन हैं? कुछ अमेरिकी लोग यह भी मानते हैं कि यह शब्द अंग्रेजी के क्यूसैट से बना है, जिसका अर्थ है सवाल। इसी तरह पजल्स के बारे में ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी (1989 एडीशन) बताती है कि 16वीं शताब्दी के अंत में यह शब्द लोग प्रयोग करने लगे थे। फिर भी क्विज और पजल्स अपने सही रूप में 1940 के आसपास दिखाई दीं, जब शिकागो में एनबीसी चैनल पर पहला क्विज शो दिखाया गया। इसे लोगों ने बहुत पसंद किया। धीरे-धीरे इस तरह के शोज पूरी दुनिया में होने लगे। क्विज और पजल्स की लोकप्रियता को देखते हुए खिलौनों और पत्र-पत्रिकाओं में इन्हें स्पेस मिलने लगा। ये तो हुई क्विज और पजल्स की शुरुआत की कहानी, अब तुम्हें बताते हैं, इनके क्या फायदे हैं-

क्विज के हैं कई फायदे

ये तुम्हें प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रेरित करते हैं।
तुम्हें सबके सामने आत्मविश्वास से जवाब देना सिखाते हैं।
तुम्हें दुनिया के प्रति  पजल्स के द्वारा हम जागरूक बनाते हैं।
क्विज के जरिये चीजों को सीखना काफी मनोरंजनपूर्ण होता है।

पजल्स बना देंगी इंटेलिजेंट

ज्यादा टार देखा गया हैं की माता पिता बच्चो को इंटेलिजट बना ने के लिए सब कुछ करतें हैं! इसी लिए हमने भी यहाँ ऐसा प्रयातंक किया हैं! समजे...

मम्मी तुम्हें अच्छा-अच्छा खाना देती हैं, जिससे तुम हेल्दी रहो। इसी तरह पजल्स तुम्हें मेंटल फूड देती हैं, ताकि तुम्हारा ब्रेन मजबूत और तेज बन जाए। समस्याओं का हल करना और सोचना सिखाती हैं पजल्स। चाहे कितनी भी आसान पजल हो, लेकिन इससे तुम तुरंत सोचना शुरू कर देते हो और तुरंत इसके हल पर पहुंचना चाहते हो।  पजल्स से आकार, रंगों के साथ-साथ यह भी समझते हो कि कोई छोटी यूनिट किस तरह बनती है। इनके जरिये अल्फाबेट्स, एनिमल्स, गणित और तमाम दूसरी चीजें सीखी जा सकती हैं।

ये मेंटल एक्सरसाइज होती है, जो तुम्हारा दिमाग शार्प बनाती है। इस तरह तुम खेल-खेल में कब इतने फायदे पा लेते हो, तुम्हें पता ही नहीं चलता। हम भी एइसा प्रयत्न करते हैं की हर तरह की पजल्स आप तक पहुंचे!

Friday, 3 March 2017

ऐसा भी होता हैं!

मेरे कई दोस्त मुझे कहते हैं! blog अच्छा चल रहा हैं!केसे ये कराती हो?बस ऐसे सभी साथियो को एक ही जवाब हैं!बच्चो के लिए काम करते समय जोभी करना हैं में करुँगी!आज हम सिर्फ पजल्स के लिए अपना ध्यान कोंसन ट्रेट कर रहे हैं!मेरे लिए ज्यादा ख़ुशी ऐ हैं की इस काम में मुझे मेरे बछो से अधिक सहयोग मिल रहा हैं!

आप को ऐ जानकर ख्शु होगी की मेरे बच्चो ने  अपने आपे से 400 से अधिक पजल्स का निर्माण किया हैं!

अब तो बच्चे खुद अपनी पजल्स बना के मुझे समजाते हैं!उनको समजता और समजाता देखकर मुझे ख़ुशी हो रही हैं!ऐसी कई रोचक जानकारी हमने इकठ्ठा कर रखी हैं!उसे हम जल्द अपडेट करेंगे! हैं जो की हम धीरे धीरे उसे अपडेट करेंगे!यहाँ में आपको ऐ जानकारी देना चाहूंगी की हम सिर्फ पजल्स नही करतें!हम बच्चो का आत्म विश्वास और गणित को बढ़ावा देने के लिए ऐ सब कर रहे हैं!आप भी हमे इस कार्यमे सहयोग करेंगे ऐसी आशा रखती हूँ!

Tuesday, 14 February 2017

गणित की भाषा...



गणित किस भाषा में सीखी जाये या गणित की भाषा कैसे सीखी जाये,बहुत समय से लोगों के मन में इस विषय में विचार आते रहे हैं।पहले प्रश्न का उत्तर है मातृ भाषा में।जहाँ तक दूसरे प्रश्न का संबंध है अधिकांश गणितज्ञों का मत है कि गणित की अपनी एक भाषा होती है।इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि  कम्प्यूटर दशमलव प्रणाली पर आधारित गणित का प्रयोग न कर अपने ढंग से द्विअंकी पद्धति का प्रयोग करते हुए भी मानवकृत सभी गणितीय समस्याओं के प्रति अच्छा तालमेल बैठा लेता है जिससे कभी कभी तो मानव स्वयं भी चकित हो जाता है।


वैसे पहले उत्तर से आज के शिक्षाविद सहमत नहीं होंगे।इसीलिये तो वह ,जो बच्चा अभी अंग्रेजी के शब्दों को भी भलीभाँति न सीख पाया हो उसे भी अंग्रेजी में गिनती पहाड़े सिखाते हैं।एक स्कूल में  एक बच्चे  को केवल इसलिये कक्षा में पीटा गया क्योंकि वह अंग्रेजी की क्लास में गणित पढ़ रहा था।अभी तक गाँवों के बच्चे इस सब से बचे हुए थे ।मजे में हिन्दी में गिनती पहाड़े पढ़ते थे जिससे गणित का एक न्यूनतम स्तर तो बन ही जाता था।थोड़ा बहुत गुणा भाग भी आ जाता था।अब शिक्षा के स्तर के साथ अंग्रेजी का स्तर भी जोड़ दिया गया है।पहले ही शिक्षकों की कमी,स्कूल में सुविधाओं की कमी के चलते उनकी शिक्षा का स्तर शहरी विद्यार्थियों की तुलना में कम रहता था।


सभी विद्वत्जनों को यह सोचना चाहिये कि जो बात शहरी परिप्रेक्ष्य में सच है वही बात ग्रामीण क्षेत्रों पर लागू हो ऐसा आवश्यक नहीं है।शहर में अगर स्कूल में अच्छे टीचर न हों तो बच्चा कोचिंग में भी अंग्रेजी पढ़ने जा सकता है।फिर पढ़ाई बीच में छोड़ देने पर उसे किसी दुकान अथवा शोरूम में बतौर सेल्समैन काम मिल सकता है।गाँव का बच्चा अगर थोड़ी बहुत अंग्रेजी जानता भी है तो रिफाइनमेन्ट की कमी के कारण उसे इस प्रकार का कोई जाब मिलने से रहा।किन्तु यदि वह थोड़ा बहुत भी गणित में तेज है तो शहर जाकर किसी दुकान या संस्थान में एकाउन्टिंग संबंधी काम उसे मिल सकता है।इस प्रकार उसे अंग्रेजी से अधिक गणित की अवश्यकता है।अंग्रेजी में केवल सजावटी टाइप के जाब मिल सकते हैं।छठी सातवीं कक्षा में हमारे भूगोल टीचर दूसरे सेक्शन में अंग्रेजी पढ़ाते थे।वह बड़ी स्टाइल से रहते थे और स्कूल के मैनेजर साहब के बार में पार्ट टाइम ,काउन्टर पर बैठते थे।इस प्रकार भाषा से अधिक स्टाइल का लाभ मिलता है।


हाल में मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों पर एक सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ है जिसमें कहा गया है कि इनमें क्रमश: ३३तथा२२.५प्रतिशत छात्र १से लेकर ९९तक के अंक भी नहीं पहचान सकते हैं ७६,७७प्रतिशत  छात्र घटाना नहींजानते हैं और  क्रमश: ७० तथा५२प्रतिशत छात्र भाग नहीं दे सकते। इन आँकड़ों से कोई निष्कर्ष निकाला जाना कठिन है।यदि ७६  प्रतिशत छात्र घटाना ही नहीं जानते हैं तब उनसे उम्मीद ही कैसे की जा सकती है कि वह भाग कर पायेंगे क्योंकि भाग में तो प्रत्येक पग पर घटाना होता है।इससे  मुझे उस फिल्म की याद आ जाती है जिसका प्रमुख पात्र सामनेवाले के सार्टिफिकेट देखकर कहता है 'अच्छा आप एम ए हैं,बहुत अच्छे,वाह आप बी ए भी हैं '।


जहाँ तक संख्याएँ पहचानने की बात है संख्याएँ हमारे जीवन की अभिन्न अंग हैं।हमारे यहाँ दीपावली में  एक पटल बनाया जाता है  जिसमें नौ खाने होते हैं।इसमें १ से लेकर ९ तक के अंक इस प्रकार लिखे होते हैं कि आड़े,बेड़ेतथा तिरछे जोड़ने पर हर दशा में जोड़ १५आता है।इस प्रकार सभी अंकों  के साथ छोटा मोटा जोड़ तो बच्चों को वैसे ही स्वाभाविक रूप से आ जाता है ।कुछ फिल्मी गानों में ही बीस से अधिक की गिनतियाँ बताई गयी हैं।नौ दो ग्यारह,छत्तीस का आँकड़ा,अठहत्तर बड़ा है कि उन्हत्तर जैसी बातें हम सब ने सुनी हैं।छींक आने पर बड़े बूढ़े शतम् जीव ,शतायु जैसे आशीर्वाद देते ही रहते हैं ।इस प्रकार १ सेलेकर १०० तक की संख्याओं का अभ्यास निरंतर चलता ही रहता है।अब यह एक विस्मय की बात है कि छात्र संख्याएँ नहीं पहचानते हैं।हो सकता है कि अंग्रेजी में गिनती के अभ्यस्त न हो इसीलिए ऐसा लगता हो। 

यदि हम देश की शिक्षा नीति की तुलना एक बैलगाड़ी से करें तो ग्रामीण शिक्षा के रूप में जुड़े एक बैल को अंग्रेजी से पूरी तरह से मुक्त कर देना चाहिये ।वहाँ(गाँव में) कोई अंग्रेजीदाँ तो जाने से रहा।यहाँ तक कि दिल्ली में भी लोग हारवर्ड तथा कैम्ब्रिज की बात करते हैं।जो लोग दिल्ली के कालेजों की कट आफ लिस्ट पार नहीं कर पाते हैं वह आस्ट्रेलिया इत्यादि में अपना ठिकाना ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं।गाँव के लोगों को अनावश्यक रूप से बोझिल न करते हुए उन्हें स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए शिक्षित होने का अवसर देना चाहिये ।शहरी शिक्षा रूपी बैल को सुन्दर रूप से सुसज्जित एवं अलंकृत करते हुए सभी शिक्षाविद् अपने प्रयोग तथा अनुसंधान कर सकते हैं तथा इनसे उपजी समस्याओं के निराकरण का प्रयास कर सकते हैं।वहीं दूसरी ओर ग्रामीण शिक्षा रूपी बैल को  ग्रामीण संसाधनों का उपयोग करते हुये अधिक बलशाली,सुन्दर एवं स्वस्थ बनाने की जरूरत है ताकि वह शिक्षा का बड़ा भार खींच सके।


शिक्षा के क्षेत्र में नये प्रयोगों पर काम करने से पूर्व हमें सदैव ध्यान रखना चाहिये कि भारत की ७० प्र.श. जनसंख्या गाँवों में निवास करती है। पता नहीं यह बात कहाँ तक सच है किन्तु इंटरमीडिएट में हमारे गणित के टीचर श्री टी एम रत्ती(श्री तोला माना रत्ती)जी यह कह कर हमारा मनोबल बढ़ाया करते थे 'तुम लोगों की अंग्रेजी अच्छी नहीं है कोई बात नहीं,जिन लोगों की अंग्रेजी अच्छी होती है उनका गणित अच्छा नहीं होता है '।हो सकता है कि इसका संबंध बनावटीपन और नैसर्गिकता से हो।इसी प्रकार एक बार हमारे विश्वविद्यालय में गणित के एक प्रसिद्ध जापानी प्रोफेसर का व्याख्यान आयोजित किया गया।परिचय में हमारे गणित विभाग के अध्यक्ष ने कहा 'हम समझते हैं कि यदि कोई विद्वान है तो उसकी अंग्रेजी अवश्य अच्छी होगी किन्तु इन्हें अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती।हम लोग भी यह देख कर विस्मित हो गये कि वह अंग्रेजी बिलकुल भी नहीं बोल पा रहे थे जब कि हम सब को गणित अंग्रेजी के माध्यम से पढ़ाई जा रही थी।

Thursday, 2 February 2017

મારું કામ...મારી આશા...

બનાસકાંઠા જીલ્લામાં ડીસા તાલુકો આગવું સ્થાન ધરાવે છે.કેટલીક બાબતોમાં ડીસા અનોખી સિદ્ધિઓ ધરાવે છે. સમગ્ર ભારતમાં સૌથી વધારે શાળાઓ ધરાવતો તાલુકો પણ ડીસા જ છે.સમગ્ર ભારતમાં બટાકા ઉત્પાદન માટે સદાય અગ્રેસર એટલે ડીસા.આટલો મોટો અને ચોક્કસ ખાસિયત ધરાવતા તાલુકામાં ફરજ બજાવતી એક શિક્ષિકાનો અહી પરિચયની અહી વાત કરવી છે.
હું નીપા અશોકકુમાર ભટ્ટ ડીસા તાલુકાના ઇન્દીરાનગર(સમ.) પ્રાથમિક શાળામાં નોકરી કરું છું..ઉચ્ચતર પ્રાથમિક વિભાગમાં ગણિત અને વિજ્ઞાનના શિક્ષક તરીકે ફરજ બજાવતા આજે મને છ વર્ષથી વધુ સમય થયો છે.શાળામાં અભ્યાસ કરતાં બાળકો માટે અનોખું અને નવતર તેઓ કરતાં રહેવું મને છે.આવું કરવાના વિચાર સાથે તેમને એક નાની પ્રવૃત્તિ શરુ કરી.

તેઓએ બાળકોના માનસિક વિકાસ માટે પ્રયત્નો કર્યા.મેન્ટલ એબેલીટી વધે તે માટે મેં ‘મેન્ટલી એબેલીટી ડેવલોપમેન્ટ માટેના પ્રયત્નો કર્યા.વિવિધ વય જૂથના બાળકો માટે કોયડાનો અભ્યાસ કર્યો.આવા કોયડા એકઠા કર્યા.નવા બનાવેલ અને શોધેલા આ કોયડાને સરળથી કઠીન તરફ ગોઠવ્યા.આ કોયડાને શાળામાં નિયમિત રજૂ કરવાનું વિચાર્યું.શાળામાં મારા ધ્વારા નિયમિત એક કોયડો રજૂ કરવામાં આવે છે.આ કામની ધીમી અને મક્કમ શરૂઆત થઇ છે.આવું હોવાથી બાળકોને  પણ સહજ રીતે  જોડાયાનો અનુભવ થાય છે.આ શાળામાં પણ ધીરે ધીરે આ અનોખી પ્રવૃત્તિની અસર થવા માંડી.આ પ્રવૃત્તિ વધવા માંડી અને સ્વીકારાયેલ છે.એનો મને આનંદ છે.

માત્ર ગણિત કે વિજ્ઞાન વિષય માટે જ નહિ.તેમના ધ્વારા બાળકોના સર્વાંગી વિકાસ માટે પ્રયત્નો કરવામાં આવે છે.સંગીતમાં વિશારદ અને શિક્ષા વિશારદ ઉપરાંત શાસ્ત્રીય  નૃત્યમાં પણ વિશારદ સુધીની લાયકાત હું ધરાવું છું.મારામાં આવેલી આ કળા માટે પણ હું સતત પ્રયત્ન કરું છું.યુવક સેવા અને સંસ્કૃતિક વિભાગ ધ્વારા અનેક કર્યો સાથે હું જોડાયેલ છે. યુનીવર્સીટી કક્ષાના યુવક મહોત્સવમાં નિર્ણાયક તરીકેની જવાબદારી અનેક વખત નિભાવેલ છે.જીલ્લાથી પ્રદેશ અને રાજ્ય સુધી વિવિધ સ્પર્ધામાં હું નિર્ણાયક તરીકે સેવા આપુ છું.છેલ્લા ચાર વર્ષથી હું રાજ્ય કક્ષાએ નિર્ણાયક તરીકે સેવા આપુ છું.ભરત નાટ્યમમાં ‘આરંગેત્રલ’ની પદવી ધરાવું છું.આ કળા બાળકોને શીખવવા અને તેના પ્રચાર પ્રસાર માટે હું પ્રયત્ન કરું છું.

ટેકનોલોજીનો ઉપયોગ અને શિક્ષણના માટે હું સદાય તત્પર છું.નવતર વિચારોને અમલી બનાવવા માટે કાર્યરત રહેવું મને ગમે છે.સમગ્ર ભારતમાંથી આવેલ નવતર વિચારો ધારિત પુસ્તક 'શોધ સૃષ્ટી'ના લેખક તરીકે મેં જવાબદારી નિભાવી છે.ખૂબ જ ચીવટ અને સરળ રીતે નવાચાર રજુ કરી શકવાને લીધે આ પુસ્તક આઈ.આઈ.એમ.ની વેબ સાઈડમાં મુકવામાં આવેલ છે.મારું આ પુસ્તક ગુજરાતીમાં પ્રકાશિત થઇ ચુક્યું છે.અંગ્રેજી અને મરાઠીમાં પણ આ પુસ્તક પ્રકાશિત થઇ રહ્યું છે.આ પ્રકારનું પુસ્તક દર વર્ષે પ્રકાશિત થાય તેવી હું મહેનત કરવા સતત પ્રયત્ન કરું છું.

સપ્તરંગી ફાઉન્ડેશન,બેંગ્લોર(7rangiskill@gmail.com) સૃષ્ટી ઓર્ગેનાઈજેશન(www.sristi.org)સાથે હાલ હું સક્રિય રીતે કાર્યરત છું.આ બ્લોગને વિવિધ પ્રકારના કોયડા અને શૈક્ષણિક રીતે ઉપયોગી થાય તે રીતે હું આગળ ધપાવવા પ્રયત્ન કરું છું.આશા રાખું કે આપના સૂચન મને મળશે.આપના સૂચનથી જ આ કામ વધુ અસરકારક બનશે તેવું મારું માનવું છે.