Tuesday, 14 February 2017

गणित की भाषा...



गणित किस भाषा में सीखी जाये या गणित की भाषा कैसे सीखी जाये,बहुत समय से लोगों के मन में इस विषय में विचार आते रहे हैं।पहले प्रश्न का उत्तर है मातृ भाषा में।जहाँ तक दूसरे प्रश्न का संबंध है अधिकांश गणितज्ञों का मत है कि गणित की अपनी एक भाषा होती है।इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि  कम्प्यूटर दशमलव प्रणाली पर आधारित गणित का प्रयोग न कर अपने ढंग से द्विअंकी पद्धति का प्रयोग करते हुए भी मानवकृत सभी गणितीय समस्याओं के प्रति अच्छा तालमेल बैठा लेता है जिससे कभी कभी तो मानव स्वयं भी चकित हो जाता है।


वैसे पहले उत्तर से आज के शिक्षाविद सहमत नहीं होंगे।इसीलिये तो वह ,जो बच्चा अभी अंग्रेजी के शब्दों को भी भलीभाँति न सीख पाया हो उसे भी अंग्रेजी में गिनती पहाड़े सिखाते हैं।एक स्कूल में  एक बच्चे  को केवल इसलिये कक्षा में पीटा गया क्योंकि वह अंग्रेजी की क्लास में गणित पढ़ रहा था।अभी तक गाँवों के बच्चे इस सब से बचे हुए थे ।मजे में हिन्दी में गिनती पहाड़े पढ़ते थे जिससे गणित का एक न्यूनतम स्तर तो बन ही जाता था।थोड़ा बहुत गुणा भाग भी आ जाता था।अब शिक्षा के स्तर के साथ अंग्रेजी का स्तर भी जोड़ दिया गया है।पहले ही शिक्षकों की कमी,स्कूल में सुविधाओं की कमी के चलते उनकी शिक्षा का स्तर शहरी विद्यार्थियों की तुलना में कम रहता था।


सभी विद्वत्जनों को यह सोचना चाहिये कि जो बात शहरी परिप्रेक्ष्य में सच है वही बात ग्रामीण क्षेत्रों पर लागू हो ऐसा आवश्यक नहीं है।शहर में अगर स्कूल में अच्छे टीचर न हों तो बच्चा कोचिंग में भी अंग्रेजी पढ़ने जा सकता है।फिर पढ़ाई बीच में छोड़ देने पर उसे किसी दुकान अथवा शोरूम में बतौर सेल्समैन काम मिल सकता है।गाँव का बच्चा अगर थोड़ी बहुत अंग्रेजी जानता भी है तो रिफाइनमेन्ट की कमी के कारण उसे इस प्रकार का कोई जाब मिलने से रहा।किन्तु यदि वह थोड़ा बहुत भी गणित में तेज है तो शहर जाकर किसी दुकान या संस्थान में एकाउन्टिंग संबंधी काम उसे मिल सकता है।इस प्रकार उसे अंग्रेजी से अधिक गणित की अवश्यकता है।अंग्रेजी में केवल सजावटी टाइप के जाब मिल सकते हैं।छठी सातवीं कक्षा में हमारे भूगोल टीचर दूसरे सेक्शन में अंग्रेजी पढ़ाते थे।वह बड़ी स्टाइल से रहते थे और स्कूल के मैनेजर साहब के बार में पार्ट टाइम ,काउन्टर पर बैठते थे।इस प्रकार भाषा से अधिक स्टाइल का लाभ मिलता है।


हाल में मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों पर एक सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ है जिसमें कहा गया है कि इनमें क्रमश: ३३तथा२२.५प्रतिशत छात्र १से लेकर ९९तक के अंक भी नहीं पहचान सकते हैं ७६,७७प्रतिशत  छात्र घटाना नहींजानते हैं और  क्रमश: ७० तथा५२प्रतिशत छात्र भाग नहीं दे सकते। इन आँकड़ों से कोई निष्कर्ष निकाला जाना कठिन है।यदि ७६  प्रतिशत छात्र घटाना ही नहीं जानते हैं तब उनसे उम्मीद ही कैसे की जा सकती है कि वह भाग कर पायेंगे क्योंकि भाग में तो प्रत्येक पग पर घटाना होता है।इससे  मुझे उस फिल्म की याद आ जाती है जिसका प्रमुख पात्र सामनेवाले के सार्टिफिकेट देखकर कहता है 'अच्छा आप एम ए हैं,बहुत अच्छे,वाह आप बी ए भी हैं '।


जहाँ तक संख्याएँ पहचानने की बात है संख्याएँ हमारे जीवन की अभिन्न अंग हैं।हमारे यहाँ दीपावली में  एक पटल बनाया जाता है  जिसमें नौ खाने होते हैं।इसमें १ से लेकर ९ तक के अंक इस प्रकार लिखे होते हैं कि आड़े,बेड़ेतथा तिरछे जोड़ने पर हर दशा में जोड़ १५आता है।इस प्रकार सभी अंकों  के साथ छोटा मोटा जोड़ तो बच्चों को वैसे ही स्वाभाविक रूप से आ जाता है ।कुछ फिल्मी गानों में ही बीस से अधिक की गिनतियाँ बताई गयी हैं।नौ दो ग्यारह,छत्तीस का आँकड़ा,अठहत्तर बड़ा है कि उन्हत्तर जैसी बातें हम सब ने सुनी हैं।छींक आने पर बड़े बूढ़े शतम् जीव ,शतायु जैसे आशीर्वाद देते ही रहते हैं ।इस प्रकार १ सेलेकर १०० तक की संख्याओं का अभ्यास निरंतर चलता ही रहता है।अब यह एक विस्मय की बात है कि छात्र संख्याएँ नहीं पहचानते हैं।हो सकता है कि अंग्रेजी में गिनती के अभ्यस्त न हो इसीलिए ऐसा लगता हो। 

यदि हम देश की शिक्षा नीति की तुलना एक बैलगाड़ी से करें तो ग्रामीण शिक्षा के रूप में जुड़े एक बैल को अंग्रेजी से पूरी तरह से मुक्त कर देना चाहिये ।वहाँ(गाँव में) कोई अंग्रेजीदाँ तो जाने से रहा।यहाँ तक कि दिल्ली में भी लोग हारवर्ड तथा कैम्ब्रिज की बात करते हैं।जो लोग दिल्ली के कालेजों की कट आफ लिस्ट पार नहीं कर पाते हैं वह आस्ट्रेलिया इत्यादि में अपना ठिकाना ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं।गाँव के लोगों को अनावश्यक रूप से बोझिल न करते हुए उन्हें स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए शिक्षित होने का अवसर देना चाहिये ।शहरी शिक्षा रूपी बैल को सुन्दर रूप से सुसज्जित एवं अलंकृत करते हुए सभी शिक्षाविद् अपने प्रयोग तथा अनुसंधान कर सकते हैं तथा इनसे उपजी समस्याओं के निराकरण का प्रयास कर सकते हैं।वहीं दूसरी ओर ग्रामीण शिक्षा रूपी बैल को  ग्रामीण संसाधनों का उपयोग करते हुये अधिक बलशाली,सुन्दर एवं स्वस्थ बनाने की जरूरत है ताकि वह शिक्षा का बड़ा भार खींच सके।


शिक्षा के क्षेत्र में नये प्रयोगों पर काम करने से पूर्व हमें सदैव ध्यान रखना चाहिये कि भारत की ७० प्र.श. जनसंख्या गाँवों में निवास करती है। पता नहीं यह बात कहाँ तक सच है किन्तु इंटरमीडिएट में हमारे गणित के टीचर श्री टी एम रत्ती(श्री तोला माना रत्ती)जी यह कह कर हमारा मनोबल बढ़ाया करते थे 'तुम लोगों की अंग्रेजी अच्छी नहीं है कोई बात नहीं,जिन लोगों की अंग्रेजी अच्छी होती है उनका गणित अच्छा नहीं होता है '।हो सकता है कि इसका संबंध बनावटीपन और नैसर्गिकता से हो।इसी प्रकार एक बार हमारे विश्वविद्यालय में गणित के एक प्रसिद्ध जापानी प्रोफेसर का व्याख्यान आयोजित किया गया।परिचय में हमारे गणित विभाग के अध्यक्ष ने कहा 'हम समझते हैं कि यदि कोई विद्वान है तो उसकी अंग्रेजी अवश्य अच्छी होगी किन्तु इन्हें अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती।हम लोग भी यह देख कर विस्मित हो गये कि वह अंग्रेजी बिलकुल भी नहीं बोल पा रहे थे जब कि हम सब को गणित अंग्रेजी के माध्यम से पढ़ाई जा रही थी।

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