एक बच्चा!पहली कक्षा में पढ़ता हैं!उसने गणित में 100 में से 95 गुण प्राप्त किए!उसके मम्मी पापा खुश हो गए!उन्हों ने पूरी सोसय्तिमें उस बात को सबके सामने रखा!कुछ साल बाद यही बच्चा!समाजी ऐ भोलू उसका नाम था!भोलू पांचवी कक्षामें आया!इस वख्त उस के मम्मी पापा ने किसीको नही बताया! क्योकि भोलू को पांचवी कक्षामें 80 प्रतिशत मार्क्स गनित्में मिले थे!
कुछ साल और गए!
भोलू दसवी कक्षामें आया!वो गणित में ही फेल हुआ!
अब मेरा सवाल!
अगर यही गणित था जो पहली कक्षामें 95 लाया था!कोई कहेगा!कक्षा एक का गणित तो सरल होता हैं!अरे बेवकुफो...गणित कक्षा एक का था!कक्षा एक के बच्चो के लिए नही वो हमारे लिए सरल था!जहा तक मेरी जानकारी हैं हर क्लास का गणित सभी बच्चो को मुश्किल ही पड़ना चाहिए!इसे और तरीके से समाज ते हैं!अगर पहेली कक्षाका गणित पहेली कक्षा के बच्चो को आ जाता हैं तो उनका ब्रेन स्ट्रोमिग कैसे होगा!
आप इस बात से भी सहमत होंगे की जो बच्चा पहली कक्षाका गणित पहली कक्षामें नहीं कर पाता हैं वो चोथी कक्षामें आने के बाद ओही गणित कर लेता हैं!इजीली गणित कर लेता हैं!
मेरे द्वारा कहे गए ऐ डॉ उदाहरन के आधार पर आप आप के सुजाव मुझे भेजें!अगर कोई ऐसा सुजाव हैं तो हम इसे यहाँ प्रकाशित करेंगे!
धन्यवाद


यह एक सच्चाई है कि अब बच्चों को न परीक्षाओं का डर है। न पढ़ाई की चिंता है। न शिक्षक के कहे की परवाह ही बची है। क्योंकि उसे भी पता है कि शिक्षक कुछ कहेंगे नहीं। ऐसी स्थिति के निर्माण का श्रेय कक्षाओं में पढ़ाई की उपेक्षा है। जिन स्कूलों में शिक्षण कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। जहाँ कक्षा में बुनियादी अनुशासन को स्कूल की संस्कृति के तौर पर बढ़ावा दिया गया है, वहां आज भी कक्षा में शिक्षकों के लिए काम करना और बच्चों को पढ़ाना अन्य स्कूलों की अपेक्षा तुलनात्मक रूप से आसान है।



