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Tuesday, 25 April 2017

क्या हुआ...


एक बच्चा!पहली कक्षा में पढ़ता हैं!उसने गणित में 100 में से 95 गुण प्राप्त किए!उसके मम्मी पापा खुश हो गए!उन्हों ने पूरी सोसय्तिमें उस बात को सबके सामने रखा!कुछ साल बाद यही बच्चा!समाजी ऐ भोलू उसका नाम था!भोलू पांचवी कक्षामें आया!इस वख्त उस के मम्मी पापा ने किसीको नही बताया! क्योकि भोलू को पांचवी कक्षामें 80 प्रतिशत मार्क्स गनित्में मिले थे!
कुछ साल और गए!
भोलू दसवी कक्षामें आया!वो गणित में ही फेल हुआ!
अब मेरा सवाल!

अगर यही गणित था जो पहली कक्षामें 95 लाया था!कोई  कहेगा!कक्षा एक का गणित तो सरल होता हैं!अरे बेवकुफो...गणित कक्षा एक का था!कक्षा एक के बच्चो के लिए नही वो हमारे लिए सरल था!जहा तक मेरी जानकारी हैं हर क्लास का गणित सभी बच्चो को मुश्किल ही पड़ना चाहिए!इसे और तरीके से समाज ते हैं!अगर पहेली कक्षाका गणित पहेली कक्षा के बच्चो को आ जाता हैं तो उनका ब्रेन स्ट्रोमिग कैसे होगा!
आप इस बात से भी सहमत होंगे की जो बच्चा पहली कक्षाका गणित पहली कक्षामें नहीं कर पाता हैं वो चोथी कक्षामें आने के बाद ओही गणित कर लेता हैं!इजीली गणित कर लेता हैं!
मेरे द्वारा कहे गए ऐ डॉ उदाहरन के आधार पर आप आप के सुजाव मुझे भेजें!अगर कोई ऐसा सुजाव हैं तो हम इसे यहाँ प्रकाशित करेंगे!
धन्यवाद 

Sunday, 23 April 2017

मशीनी रिश्ते


जॉन डिवी कहते हैं, “व्यक्ति समुदाय में रहते हैं क्योंकि उनके बीच कुछ सामान्य बातें होती हैं; और संप्रेषण ऐसा रास्ता है जिससे वे उन सामान्य वस्तुओं को प्राप्त करते हैं। एक समुदाय व समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है कि उनके बीच कुछ बातें सामान्य हों। ये बातें हैं: लक्ष्य, आस्थाएं, आकांक्षाएं, ज्ञान और आम समझ। समाजशास्त्रियों की शब्दावली का उपयोग करें तो कहा जाएगा, विचारों की समानता। ये बातें, एक से दूसरे को, भौतिक रूप में नहीं दी जा सकती हैं, जैसे ईंटें दी जा सकती हैं; उन्हें लोग उस प्रकार नहीं बांट सकते जैसे समोसे या गुझिया के स्थूल टुकड़ों को बांटकर खाते हैं।

सामान्य विचारों में भागीदारी ऐसे संप्रेषण से उत्पन्न होती है जिससे समान भावनात्मक और बौद्धिक स्वभाव का निर्माण होता है, अपेक्षाओं और आवश्यकताओं के प्रति समान अनुक्रिया का निर्माण होता है।”

सहमति के लिए संप्रेषण जरूरी है

समाज का निर्माण उसमें रहने वाले लोगों की शारीरिक निकटता से नहीं होता। इसी प्रकार, किसी व्यक्ति पर सामाजिक प्रभाव पड़ना केवल इस कारण से बंद नहीं होता कि वह दूसरे लोगों से कुछ फीट या मीलों की दूरी पर रहता है। एक दूसरे से हजारों मील की दूरी पर रहने वाले व्यक्तियों के बीच जितनी घनिष्टता एक पुस्तक या पत्र के द्वारा कायम हो सकती है, उतनी घनिष्टता एक छत के नीचे रहने वाले लोगों के बीच भी नहीं हो सकती। 
ऐसे व्यक्तियों से भी सामाजिक समूह का निर्माण नहीं होता जो सभी सामान्य लक्ष्य के लिए काम करते हों। एक मशीन के पुर्जे समान नतीजे हासिल करने के लिए अधिकतम सहयोग से काम करते हैं, लेकिन वे समुदाय का रूप नहीं लेते। लेकिन यदि वे सब सामान्य लक्ष्य को पहचानते हों और सभी उसमें इतनी रुचि रखते हों कि अपनी विशेष क्रिया को उसी दृष्टि से नियमित करते हों तो वे समुदाय का रूप ले सकते हैं। लेकिन इसके लिए संप्रेषण की जरूरत होगी। इनमें से हर एक को जानना होगा कि दूसरा क्या कर रहा है और हर एक को अपने प्रयोजन और प्रगति के बारे में दूसरे को किसी न किसी प्रकार बताना होगा। सहमति के लिए संप्रेषण जरूरी है।

समाज के मशीनी रिश्ते

अतः हम यह मानने के लिए विवश होते हैं कि सर्वाधिक सामाजिक समूह में भी ऐसे अनेक संबंध होते हैं जो आज तक सामाजिक नहीं बन सके हैं। किसी भी सामाजिक समूह में अनेक ऐसे मानव संबंध होते हैं जो अभी तक मशीनी स्तर पर ही कायम हैं। जो आप चाहते हैं, उन परिणामों को पाने के लिए व्यक्ति एक दूसरे का उपयोग करते हैं, और ऐसा करते समय, वे उन लोगों के भावनात्मक और बौद्धिक मिजाज की परवाह नहीं करते जिनका वे उपयोग करते हैं। दूसरे का इस प्रकार उपयोग करके वे अपनी शारीरिक श्रेष्ठता अथव अपनी स्थिति, कौशल, तकनीकी योग्यता अथवा अपने मशीनी या वित्तीय साधनों की श्रेष्ठता को अभिव्यक्त करते हैं।
जब तक माता-पिता और संतान, शिक्षक-छात्र, मालिक और नौकर, शासक और शासित के बीच संबंध इस स्तर पर कायम रहते हैं तब तक यह नहीं कहा जा सकता है कि वे वास्तविक सामाजिक समूह के अंग हैं, भले ही अपनी-अपनी गतिविधियों के कारण उनके बीच कितनी ही निकटता क्यों न हो। आदेश देने और आदेश लेने से क्रिया और परिणाम का स्वरूप तो बदल सकता है लेकिन उससे प्रयोजनों की भागीदारी पैदा नहीं होती, सरोकारों का संप्रेषण नहीं होता।
सामाजिक जीवन न केवल संप्रेषण से अभिन्न होता है बल्कि सभी प्रकार का संप्रेषण (अतः सभी प्रकार का वास्तविक सामाजिक जीवन) शिक्षाप्रद होता है। संप्रेषण की प्राप्ति से अनुभव की वृद्धि होती है और उसमें परिवर्तन होता है। संप्रेषण करने वाला भी इस प्रक्रिया में प्रभावित होता है।


Saturday, 22 April 2017

भयमुक्त वातावरण क्या हैं...!

भयमुक्त वातावरण

इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा काम हुआ है। अब स्कूल में बच्चों को खुल तौर पर पीटने वाली स्थितियां कभी-कभार ही दिखाई देती हैं। ऐसा होने पर सख़्त कार्रवाई होती है। इस कारण से शिक्षक भी बच्चों को पीटने से बचते हैं या डरते हैं। अभिभावक भी इस बात को समझते हैं और स्कूल में शिकायत के लिए पहुंच जाते हैं, इसका भी असर पड़ा है। मगर भयमुक्त माहौल बनाने के लिए नाम पर स्कूलों में जो हुआ है, वह काफी भयावह है।
बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता हैयह एक सच्चाई है कि अब बच्चों को न परीक्षाओं का डर है। न पढ़ाई की चिंता है। न शिक्षक के कहे की परवाह ही बची है। क्योंकि उसे भी पता है कि शिक्षक कुछ कहेंगे नहीं। ऐसी स्थिति के निर्माण का श्रेय कक्षाओं में पढ़ाई की उपेक्षा है। जिन स्कूलों में शिक्षण कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। जहाँ कक्षा में बुनियादी अनुशासन को स्कूल की संस्कृति के तौर पर बढ़ावा दिया गया है, वहां आज भी कक्षा में शिक्षकों के लिए काम करना और बच्चों को पढ़ाना अन्य स्कूलों की अपेक्षा तुलनात्मक रूप से आसान है।
एक कक्षा से अगली कक्षा में क्रमोन्नत करने वाली व्यवस्था ने प्राथमिक स्तर पर शिक्षा व्यवस्था को पटरी से उतार दिया है, अगर ऐसा कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि सच्चाई यही है। शिक्षकों के लिए वह काम सबसे ज्यादा जरूरी है जो दस्तावेज के रूप में दिखाई देता है।
कक्षाओं में होने वाले काम का मूल्यांकन परीक्षाओं के माध्यम से करने की कोशिश कुछ राज्यों में फिर से शुरू हुई है ताकि पढ़ाई के प्रति शिक्षकों को जवाबदेह बनाया जा सके। अब तो क्रमोन्नत करने वाली व्यवस्था पर भी पुनर्विचार हो रहा है। ताकि पढ़ाई के महत्व को फिर से स्थापित किया जा सके। शिक्षा का अधिकार क़ानून-2009 के अनुच्छेद-16 का एक खण्ड के रूप में नो डिटेंशन पॉलिसी को शामिल किया गया है। यह कहता है, “स्कूल में प्रवेश लेने वाले किसी भी बच्चे को किसी क्लास में फिर से नहीं रोका जाएगा या प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक स्कूल से बाहर नहीं निकाला जाएगा।”

Friday, 21 April 2017

इसे अवश्य पढ़ें...!

एक जिला शिक्षा अधिकारी शिक्षकों को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि शिक्षा के अधिकार के लिए हमें कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। आप भी पढ़िए।
1.स्कूल में बच्चों का दाख़िला करवा दो – नामांकन
2.बच्चों को भूल करके भी मारो-पीटो मत – भयमुक्त वातावरण
3.अगले साल अगली कक्षा में प्रमोट कर दो – क्रमोन्नत करना 
4.बस इतना ध्यान रखो कि बीच में स्कूल से ग़ायब न हों ये बच्चे और स्कूल आते रहें – बच्चों का ठहराव सुनिश्चित करना
अपने संबोधन के आखिर में उन्होंने कहा, “एक बार आपने इन लक्ष्यों को हासिल कर लिया तो समझो बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिल गया और हमें अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति।”

वास्तविक स्थिति

उपरोक्त बातों के संदर्भ में अगर शिक्षा का अधिकार कानून-2009 को देखें तो बहुत सी बातें बिल्कुल सटीक हैं। जैसे बच्चों का नामांकन सुनिश्चित करना ताकि आठ करोड़ से ज्यादा बच्चे जो स्कूल से बाहर हैं उनको स्कूल से जोड़ा जा सके। उनको भी पढ़ने-लिखने में सक्षम बनाया जा सके। ऐसे बच्चों की पढ़ाई पूरी करवाने के लिए विभिन्न संस्थाओं की तरफ से ब्रिज कोर्स या अन्य माध्यमों से उम्र के अनुसार कक्षा में प्रवेश देकर काम किया जा रहा है। मगर सारे बच्चों के लिए यह तरीका सही है।
स्कूल में शिक्षकों को इस बात का डर होता है कि अगर बड़े बच्चों को छोटी कक्षाओं में कुछ सीखने के लिए बैठाते हैं तो अधिकारी नाराज हो सकते हैं, अगर वे दौरे पर आते हैं। इस तरह के नजरिये के कारण भी हम ऐसे बच्चों के लिए कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं। ऊपर से स्थिति तब ज्यादा गंभीर नजर आती है जब सातवीं-आठवीं में पढ़ने वाले ऐसे बच्चे जो नियमित स्कूल आते हैं वे भी खुद को पढ़ना-लिखना सीखने में अन्य बच्चों की तुलना में काफी पीछे पाते हैं। यानि स्थितियां बड़े बदलाव की आश में बैठी हैं। शिक्षा के अधिकार की ऊपरी-ऊपरी बातों पर अमल से बात नहीं बनेगी।
उदाहरण के लिए जब स्कूल में शिक्षकों को नामांकन कम होने के कारण नोटिस मिलता है तो उनको समझ में आता है कि हमारी प्राथमिकता नामांकन है। इसलिए वे अगले साल सारा ध्यान बच्चों का नामांकन बढ़ाने पर लगा देते हैं। उनमें से कितने बच्चे रोजाना स्कूल आ रहे हैं और कितने बच्चे सीख रहे हैं, यह बात उनके ध्यान से हट सी जाती है। जबकि पूरी चर्चा बच्चों के सीखने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने पर केंद्रित होनी चाहिए थी। मगर इस बात का जिक्र न अधिकारियों की बात में मिलता है और न शिक्षकों के रोजमर्रा के शब्दकोश में ऐसी बातें शामिल होती हैं। वे कभी-कभार कहते भी हैं कि हम तो सरकार के नौकर हैं, सरकार जो कहेगी वह करेंगे। हमारे लिए नौकरी बचाना पहली प्राथमिकता है, उसके लिए जो जरूरी है वो करेंगे। बाकी सारी बातें तो बाद में आती हैं।

Thursday, 23 March 2017

पहेली और पजल्स

दुनिया में कई सरे लोग अनूठे काम करते हैं! ऐसा ही एक काम किया हैं !जिनका नाम हैं रॉबर्ट!फिलिपाईन्स के
एक शहर में वो रहते हैं! छोटे से इस शहर का नाम हैं जोनेप्पा !यहाँ दुनिया के पजल्स खेलने वाले महारथी आते रहते हैं! पजल गेम दुनिया के सबसे अच्छे दिमागी खेल हैं। पजल को सुलझाना मतलब दिमाग का पूरा व्यायाम। पर कई पजल्स ऐसे होते हैं, जिन्हें हम चाहकर भी हल नहीं कर पाए। ऐसा ही एक पजल इन दिनों फेसबुक पर धूम मचा रहा है, जिने हल करने की हजारों लोग नाकाम कोशिश कर चुके हैं।फिलीपींस बेस्ड एक युवती जेया मेय क्रूज ने फेसबुक पर ऐसा पजल शेयर किया, जिसे हल करने में अच्छे अच्छों के पसीने छूट गए। लोग इसे जमकर शेयर कर रहे हैं।
जोनेप्पा स्थित इस व्यक्ति ने दुनिया में न सुल्ज ने वाली पजल्स इकठा की हैं! यहाँ आके कोई भी इसे खेलने की चुनोती ले सकता हैं! भारत से एक बार वीरेंद्र कुमार जी भी गए थे!उन्हों ने यहाँ से ेआके एक पुस्तक का संपादन किया हैं! इस बुक को देखा के या मेय क्रूज ने फेसबुक पर लिखा, चलो एक गेम खेलते हैं। आप इस पोस्ट में मोबाइल ढूंढिए। जेया मेय क्रूज ने फेसबुक पर ये पोस्ट 2 जुलाई को डाला था, जिसे अबतक लगभग डेढ़ लाख लोग लाइक कर चुके हैं, तो 17 हजार से अधिक लोग साझा कर चुके हैं। अब आप भी अपना दिमाग लगा सकते हैं और इस तस्वीर में से मोबाइल ढूंढकर दिखा सकते हैं।खैर, काफी लोगों के प्रयासों के बाद भी जब ये पहेली हल नहीं हुई, जेया मेय क्रूज ने दूसरा पोस्ट फेसबुक पर डाला। उन्होंने लोगों का शुक्रिया किया।
हमारा भी यहाँ छोटा सा प्रयत्न हैं की आप भी ऐसी पहेलियाँ बनाए और इसे सोल्व करने के तरीको के बारेमे सोचे!आप हम से जुड़े हम साथ में कुछ न्य करेंगे!

Friday, 10 March 2017

सवाल केसे खोजे...

मेने पहले एक बार लिखा था!

हमें बछो से सवाल करने चाहिए!(यहाँ पढ़े)

उस वख्त मेरे एक दोस्त ने मुझे इस के बारे में सवाल किए!उन्होंने कहा!अरे...हर बार सवाल कहांसे लाए!ऐसे सवाल भी तो मिलने चाहिए?

सवाल खोजने का और जवाब पाने का शायद अपना तरीका ही गलत हैं!हमें ऐसा लगता हैं की सवाल तो इकाई के बाद ही होते हैं!ऐ सवाल भी ऐसे ही होते हैं जिन के जवाब हम नहीं देना चाहते!ऐसे जवाब से पहले हमें सवाल भी समज लेने चाहिए!मेरे उस दोस्त की बात भी सही हैं!में जिस तरीके को समजना चाहती हौं इस के लिए में यहाँ आज एक चित्र के बारेमे बताउगी!आप इस चित्र को देखे!छोटी बच्ची ख़ास काम कर रही हैं!कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम में ऐ सब बच्चियाँ कड़ी हैं!शायद कुछ प्रोग्राम हैं!अब इस फोटो के जरिए आप सवाल जवाब कर सकते हैं!

1.कितनी लड़किया हैं!
२.कोण कोण से रंग के छाते हैं!
3.सबसे छोटी लड़की कोन हो सकती हैं?
4.छोटी चोटी बने हुई लड़किया कितनी हैं?

ऐसे तो कई सवाल हैं! जो इस चित्र के माध्यम से आप पूछ सकते हैं!मेने यहाँ सेम्पल सवाल दिए हैं!ऐसा नहीं की हम सिर्फ चित्र के आधार पर ही सवाल करे!अगर ट्राफिक में खड़े हैं! बेठे बेठे क्या करेंगे!बछे को उस वख्त पूछ सकते हैं की कोनसी कंपनी की गाड़ी यहाँ ज्यादा हैं!ऐ और ऐसे कई सवाल!आगे भी ऐसे सवाल जवाब के साथ मिलते रहेंगे!

Monday, 6 March 2017

सिर्फ पजल्स नहीं...!

में आप से बात करना चाहती हूँ!में आप से सवाल करना चाहती हूँ!!मेरी बात सिंपल हैं!सो...सवाल भी सिंपल ही हैं!मेरा सवाल ये हैं की बच्चे सवाल क्यों करते हैं!?क्या हम हर सवाल का जवाब दे पाते हैं!?एक बार अध्यापन काम करते समय मुझे एक बच्ची ने सवाल किया!सवाल भी बहोत सटीक था!मुझे मालुम पड़ा की बच्चे भी ऐसे सवाल करते हैं जिसके लिए हमें भी जवाब नहीं मालुम होता हैं!

में जब अध्यापन कार्य कराती हु उस वख्त कभी कभी में सवाल जवाब कराती हूँ!ऐ सवाल ऐसे होते हैं जो कभी किताबा में पढाये नहीं जाते!आज ऐसे कई सवाल हैं जेसके बारे में हम बात करेंगे!एक लड़का, नाम विष्णु!विष्णु ने बताया की हरेक गाडी के स्टेरिंग गोल ही क्यों होते हैं?ऐ सवाल भी तो हैं!की हर गाडी के स्टेरिंग गोल ही क्यों हैं?

ऐ बात हुई...

दूसरी एक लड़की!नाम आशा भांडव !वो बोलती हैं की बरसात के पहेले पानी तो आकाश में होता हैं!तो बरसात के पहेले ठंडक क्यों होती हैं?अब ऐ सवाल में समाज तो सकती थी मगर उसका रीजन बता नहीं पाती हूँ!ऐसे कई सवाल हैं जिस के बारे में हमें मालुम हैं मगर हम उस बात को समजा नहीं सकते!

पानी जीतनी देर में गर्म होता हैं उस से ज्यादा समय वो पानी ठंडा होने में क्यों जाता हैं!मेने और मेरे साथियों ने ऐसे सवाल पे काम किया हैं!हम ऐसे सवाल और जवाब देनेका प्रयत्न करेंगे!

Tuesday, 28 February 2017

Anil gupta एक शोधको के शोधक...

neepa...neepa bhatt...www.नीपभात्त.blogspot.com...इनोवेशन...शोध्स्रुस्ती..NEEPA...ANIL GUPTA...GUPTA NEEPA...ANIL NEEPAA ARPIT BHAT...INNOVATION...IIM...SRISTI...NIF...nif...neeeeeep..teacher neepa...deesa...deesa..teacher deesa....eepa...teacher....a
नॅशनल क्रिएटिविटी कार्यशाला में अनिल अनिल गुप्ता सर के कर क्म्लोसे मेरा सन्मान 
अनिल गुप्ता सर!आज उनका जन्म दिवस था!उनकी आयु अब 63 साल ख़तम कर चुके हैं!उनके काम को 
देखकर हमे भी प्रेरणा मिलती हैं!
उन्होंने अपने जीवन को ग्रास रूट इनोवेटर के लिए जेसे की अर्पण किया हैं!उनका जन्म दिन भी ख़ास हैं!आज के दिन को समग्र भारत में राष्ट्रिय विज्ञान दिवस के तोर पे मनाया जाता हैं!वो छोटे बच्चो से लेकर के इज्नेरो के साथ भी काम करते हैं!

कई देशो के प्रतिनिधि उनको मिलने के लिए कतार में खड़े हुए मेने देखे हैं!उनका हर टपके में योगदान हैं!उनको काम करता देखते हुए हमें भी योगदान देने की प्रेरणा मिलती हैं!

अगर में कहूँ की बच्चो के अंदर जो नई सोच है,उसे बाहर लाकर उसको एक नया आकार देके  देश को समर्पित करने का एक नया रास्ता उनसे ही मुझे मिला है।आपके साथ काम करते  करते समय का कैसे सदुपयोग किया जाय वो मुझे सिखनेको मिला है।बच्चो को फिल्ड में ले जाकर समस्या की जानकारी इकठ्ठा करके समस्या का हल भी बच्चोंके पास से ही खोजने का उनका तरीका अनूठा हौं!ये सब काम नेशनल कॉन्फ्रेंस  में किऐ जाते हैं!जब उनके साथ हम नॅशनल कोंफ्रंस में काम करते हैं तो मुझे ऐसा लगता हैं की वो हर बात जानते हैं फिरभी हमसे पूछते हैं!उनका यही सहज स्वभाव मुझे उनसे काम करने की प्रेरणा देता हैं!

नॅशनल इनोवेशन फ़ौंडेशन के वाइस चेरमेन!सृष्टि के संस्थापक और हनिबी नेटवर्क के फौंदर होने के साथ साथ वो केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के फेलो पद्म श्री अनिल गुप्ता सर को उनके जन्म दिवस के उपलक्ष में शुभकामना!