एक जिला शिक्षा अधिकारी शिक्षकों को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि शिक्षा के अधिकार के लिए हमें कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। आप भी पढ़िए।
1.स्कूल में बच्चों का दाख़िला करवा दो – नामांकन
2.बच्चों को भूल करके भी मारो-पीटो मत – भयमुक्त वातावरण
3.अगले साल अगली कक्षा में प्रमोट कर दो – क्रमोन्नत करना
4.बस इतना ध्यान रखो कि बीच में स्कूल से ग़ायब न हों ये बच्चे और स्कूल आते रहें – बच्चों का ठहराव सुनिश्चित करना
अपने संबोधन के आखिर में उन्होंने कहा, “एक बार आपने इन लक्ष्यों को हासिल कर लिया तो समझो बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिल गया और हमें अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति।”
वास्तविक स्थिति
उपरोक्त बातों के संदर्भ में अगर शिक्षा का अधिकार कानून-2009 को देखें तो बहुत सी बातें बिल्कुल सटीक हैं। जैसे बच्चों का नामांकन सुनिश्चित करना ताकि आठ करोड़ से ज्यादा बच्चे जो स्कूल से बाहर हैं उनको स्कूल से जोड़ा जा सके। उनको भी पढ़ने-लिखने में सक्षम बनाया जा सके। ऐसे बच्चों की पढ़ाई पूरी करवाने के लिए विभिन्न संस्थाओं की तरफ से ब्रिज कोर्स या अन्य माध्यमों से उम्र के अनुसार कक्षा में प्रवेश देकर काम किया जा रहा है। मगर सारे बच्चों के लिए यह तरीका सही है।
स्कूल में शिक्षकों को इस बात का डर होता है कि अगर बड़े बच्चों को छोटी कक्षाओं में कुछ सीखने के लिए बैठाते हैं तो अधिकारी नाराज हो सकते हैं, अगर वे दौरे पर आते हैं। इस तरह के नजरिये के कारण भी हम ऐसे बच्चों के लिए कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं। ऊपर से स्थिति तब ज्यादा गंभीर नजर आती है जब सातवीं-आठवीं में पढ़ने वाले ऐसे बच्चे जो नियमित स्कूल आते हैं वे भी खुद को पढ़ना-लिखना सीखने में अन्य बच्चों की तुलना में काफी पीछे पाते हैं। यानि स्थितियां बड़े बदलाव की आश में बैठी हैं। शिक्षा के अधिकार की ऊपरी-ऊपरी बातों पर अमल से बात नहीं बनेगी।
उदाहरण के लिए जब स्कूल में शिक्षकों को नामांकन कम होने के कारण नोटिस मिलता है तो उनको समझ में आता है कि हमारी प्राथमिकता नामांकन है। इसलिए वे अगले साल सारा ध्यान बच्चों का नामांकन बढ़ाने पर लगा देते हैं। उनमें से कितने बच्चे रोजाना स्कूल आ रहे हैं और कितने बच्चे सीख रहे हैं, यह बात उनके ध्यान से हट सी जाती है। जबकि पूरी चर्चा बच्चों के सीखने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने पर केंद्रित होनी चाहिए थी। मगर इस बात का जिक्र न अधिकारियों की बात में मिलता है और न शिक्षकों के रोजमर्रा के शब्दकोश में ऐसी बातें शामिल होती हैं। वे कभी-कभार कहते भी हैं कि हम तो सरकार के नौकर हैं, सरकार जो कहेगी वह करेंगे। हमारे लिए नौकरी बचाना पहली प्राथमिकता है, उसके लिए जो जरूरी है वो करेंगे। बाकी सारी बातें तो बाद में आती हैं।

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