भयमुक्त वातावरण
इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा काम हुआ है। अब स्कूल में बच्चों को खुल तौर पर पीटने वाली स्थितियां कभी-कभार ही दिखाई देती हैं। ऐसा होने पर सख़्त कार्रवाई होती है। इस कारण से शिक्षक भी बच्चों को पीटने से बचते हैं या डरते हैं। अभिभावक भी इस बात को समझते हैं और स्कूल में शिकायत के लिए पहुंच जाते हैं, इसका भी असर पड़ा है। मगर भयमुक्त माहौल बनाने के लिए नाम पर स्कूलों में जो हुआ है, वह काफी भयावह है।
यह एक सच्चाई है कि अब बच्चों को न परीक्षाओं का डर है। न पढ़ाई की चिंता है। न शिक्षक के कहे की परवाह ही बची है। क्योंकि उसे भी पता है कि शिक्षक कुछ कहेंगे नहीं। ऐसी स्थिति के निर्माण का श्रेय कक्षाओं में पढ़ाई की उपेक्षा है। जिन स्कूलों में शिक्षण कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। जहाँ कक्षा में बुनियादी अनुशासन को स्कूल की संस्कृति के तौर पर बढ़ावा दिया गया है, वहां आज भी कक्षा में शिक्षकों के लिए काम करना और बच्चों को पढ़ाना अन्य स्कूलों की अपेक्षा तुलनात्मक रूप से आसान है।
एक कक्षा से अगली कक्षा में क्रमोन्नत करने वाली व्यवस्था ने प्राथमिक स्तर पर शिक्षा व्यवस्था को पटरी से उतार दिया है, अगर ऐसा कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि सच्चाई यही है। शिक्षकों के लिए वह काम सबसे ज्यादा जरूरी है जो दस्तावेज के रूप में दिखाई देता है।
कक्षाओं में होने वाले काम का मूल्यांकन परीक्षाओं के माध्यम से करने की कोशिश कुछ राज्यों में फिर से शुरू हुई है ताकि पढ़ाई के प्रति शिक्षकों को जवाबदेह बनाया जा सके। अब तो क्रमोन्नत करने वाली व्यवस्था पर भी पुनर्विचार हो रहा है। ताकि पढ़ाई के महत्व को फिर से स्थापित किया जा सके। शिक्षा का अधिकार क़ानून-2009 के अनुच्छेद-16 का एक खण्ड के रूप में नो डिटेंशन पॉलिसी को शामिल किया गया है। यह कहता है, “स्कूल में प्रवेश लेने वाले किसी भी बच्चे को किसी क्लास में फिर से नहीं रोका जाएगा या प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक स्कूल से बाहर नहीं निकाला जाएगा।”
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